भोपाल की होली (रंग बरसे आप झूमे श्रृंखला भाग ४)

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भाई आज बारी है हमारे शहर की होली की ,याने भोपाल की होली ,गंगो जमनी संस्कृति मैं शायद ये रंग होली ने हीघोला हैं। शहर को जानने वाले जानते हैं शहर दो भागों मैं बटा है नया भोपाल पुराना भोपाल ,पुराने भोपाल में कुछज्यादा ही उत्साह से होली मानती है ,यहाँ होली उत्सव पाँच दिन चलता है होली से शुरू होकर यह त्यौहाररंगपंचमी तक पूरे शहर को रंगीन किया करता है होली के दिन शहर के हर गली मुहल्ले मैं होलिका कर निकलपड़ते है हुल्लिआडे होली मानाने हाथों मैं रंगों की थैली ,पुरानी शर्ट और पैंट जिनके लिए वोह आखिरी शाम हीसाबित होती है,जाते हैं अपने दोस्तों के यहाँ , परिवारों मैं चौराहों पर ,जो मिलता है उसे रंग मैं भिडा देना ही इनकीजीत होती है और उल्लास से भर देती है, लाल, कला, हरा, नीला जाने कितने ही रंग घरों की छतों से छोटे बच्चेआने जाने वालों पर पिचकारी,रंगों से भरे फुग्गों से तर करते हैं , पीरगेट(सोमवारा) , चौक, करोंद, सिन्धी कालोनी, जवाहर चौक और अशोका गार्डन में तो विशेष रूप से बड़े बड़े हौद तैयार किए जाते है जहाँ होली से बच रहे लोगों कोपकड़ पकड़ कर नेहलाया जाता है कहा जाता है की भाई आज तो नहा लो,फिर क्या है ! कई जगहों पर भंग कीगुमठियां और भंग की आइसक्रीम के ठेले लग जाते हैं और लोग भांग के नशे में तर और सर पे सवार रंग के नशे केसाथ उतर जाते हैं सड़कों पर ,कुछ तो बेचारे कीचड़ की होली भी खेल लेते हैं अब ढोल तो कम ही सुनाई देते हैंउनकी जगह डी जे कमी को पूरा कर देते हैं गाने होते हैं-'पापी चुलो' ,' देखें जरा ',बीच बीच में 'ये देश है वीरजवानों भी सुनाई देता है' सच मानिए भोपाल में लोगों
को झूमते देखना अपना अलग अनुभव है। शाम बजेतक ये हुरदंग ख़तम हो जाता है और लोग अपने घर लौटकर,गुजिया पपडिया ,खा कर और जो पैर लंबे करते है कीशाम उन्हें उठाने में अपना समय ही बरबाद नही करती शाम होने पर कुछ शान्ति प्रिय युवक निकलते हैं गुलाललेकर और शहर में होली जारी रहरी है
भोपाल में असली होली तो होती है रंग पंचमी पर जब चल समारोह निकलता है ,बाकायदा नगरनिगम के टेंकरपानी के की धार से लगातार समारोह को सराबोर करते हैं,ढोल होते हैं बंद होता है,अरे भाई पूछिए क्या नही होतामहापौर भी होते हैं और बीच बीच में जगह जगह के पार्षद भी। बिना किसी जाती या धर्म के हर एक सिर्फ़ रंगीन हीदीखता रंग ही मेरा रंग ही मेरा इमां नज़र आता हैं ,हजरत आमिर खुसो का कलाम 'आज रंग है री ,माँ रंग है री मोहे पीर पायो ..' ऐसे ही हर कोई यहाँ रंग में खो जाने के बाद ख़ुद को पहचानने की कोशिश करता है और कोई कोई रंग तो सब को भाता ही है ...तो इसी उम्मीद के साथ के आप भी रंगीन हुए होंगे लीजिये प्रस्तुत है ये मस्ती भरा गीत फ़िल्म नवरंग से .





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1 Response to भोपाल की होली (रंग बरसे आप झूमे श्रृंखला भाग ४)

11:02 PM, March 02, 2009

पोस्ट ने होली इतनी खेल ली है कि पढ़ने में ही नहीं आ रही है। जरा नहला के भेजो। [Reply]

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