भारतीय चुनाव सुधार

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पिछले अंक में हमने भारत में चुनाव प्रक्रिया को समझा , लोकतंत्र में संविधान को प्रमुख और सर्वोच्च मान कर लोकतान्त्रिक कार्यों का संचालन होता है, चुनाव प्रक्रिया में हम एक महत्वपूर्ण बात बताना चूक गए जिस पर हमारा ध्यान राज भाटिया जी ने एक टिपण्णी के मध्यम से दिलाया के - span style="font-style: italic;">बहुमत वाले दल को ५४३ सीटो मे से कितनी सीटे चाहिये अपना बहुमत साबित करने के लिये, ओर कम से कम कितने प्रतिशत मत दान होना चाहिये - सभी भारतीय चुनावों में बहुमत वाले दल अपना बहुमत साबित करने के लिए कम से कम 50% मतों या सीटों का मिलना ज़रूरी होता है । लोकसभा के 543 सदस्यों वाले सदन में कम से कम 272 सीटें अपना बहुमत साबित करने आवश्यक हैं । पर फिलहाल तो हम भी ये ढूँढने में असमर्थ रहे के न्यूनतम मतदान प्रतिशत कितना होना चाहिए एक चुनाव को वैध कहलाने के लिए ।
आज हम चुनाव सुधारों पर बात करेंगे
चुनाव सुधार के मुद्दे पर इस मुल्क में पिछले कई दशकों से बहस जारी है। चुनाव सुधार की बातें प्राय: सभी पार्टियां कर रही हैं और करती रहीं हैं। लेकिन आवश्यक सुधार आज तक नहीं हुए।
भारत के चुनावों में 1967 के बाद वृहद रूप से गलत प्रवृत्तियां उभरीं। यह प्रवृत्तियां थीं- धन, बल, जोर-जबर्दस्ती, जाति, चुनावी हिंसा, दलबदल, संप्रदाय और सत्ता के दुरूपयोग की प्रतृत्ति। यह प्रवृत्तियां चुनाव प्रणाली को दूषित करने लगी। संसद और विधानसभाओं के लिए होने वाले चुनावों में इसकी स्पष्ट छाप दिखाई देने लगी और अब इन तंत्रों के सहारे लोकतंत्र के इन सर्वोच्च संस्थाओं में अपराधियों की भरमार होने लगी है।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने 10 फरवरी 1992 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने चुनाव सुधार पर मई 1990 में पेश पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री दिनेश गोस्वामी समीति की रिपोर्ट को लागू करने की सिफारिश की थी। ऐसा नहीं है कि यह चुनाव सुधार के लिए पहली रिपोर्ट थी, इससे पहले भी इस कार्य हेतु कई रिपोर्ट आ चुकी हैं।
चुनाव आयोग ने 1970 में विधि मंत्रालय को चुनाव सुधार से संबंधित अपना पहला विस्तृत प्रस्ताव प्रारूप सहित भेजा था। 1975 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, जनसंघ, अन्नाद्रमुक आदि दलों की संयुक्त समीति ने अनेक सुझाव दिये। 1975 में आठ दलों ने एक स्मार पत्र दिया, जिसमें कई सुझाव दिए गए थे। स्व. जयप्रकाश नारायण ने प्रसिद्ध न्यायविद् वीएम तारकुंडे की अध्यक्षता में चुनाव सुधार पर विचार के लिए एक कमेटी गठित की। चुनाव आयोग ने 1977 में पूर्व के सभी सुधारों से संबंधित प्रस्तावों की समीक्षा कर 22 अक्टूबर 1977 को एक समग्र प्रतिवेदन भारत सरकार को भेजा। 1982 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एसएल शकधर ने पूर्व के सभी सुझावों की समीक्षा के बाद एक नया प्रस्ताव भारत सरकार को भेजा। इस तरह लगातार इस संबंध में सुझाव आयोग द्वारा भारत सरकार को भेजे जाते रहे, जिनमें कुछ पर ही अमल हो पाया।
कई संसोधन तो केवल लाभ उठाने के उद्देश्य से ही किए गए, जैसे लगभग 23 वर्ष पहले जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 77 की उपधारा (1) में स्पष्टीकरण 1 जोड़ा गया था। इसके अंतर्गत उम्मीदवार के अलावा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा जिसमें उसकी राजनीतिक पार्टी, मित्र और समर्थक शामिल हैं, खर्च किया गया धन, उम्मीदवार के चुनाव खर्च में शामिल नहीं किया जाएगा। इस स्पष्टीकरण के अंतर्गत किसी उम्मीदवार के चुनाव में उसकी पार्टी या समर्थकों द्वारा बेहिसाब धन खर्च किया जा सकता है। अनेक लोगों और उच्चतम न्यायालय ने इस स्पष्टीकरण की आलोचना की है लेकिन निहित स्वार्थ के कारण इसे अभी तक हटाया नहीं गया है।

प्रमुख चुनाव सुधार - एक नजर में

• 1995 के बाद मतदाताओं के पहचान पत्र का उपयोग होने लगा। प्रारंभ में यह केवल मतदान के उद्देश्य को लेकर बनाए गए लेकिन पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त वीएस रमा देवी ने इसे बहुद्देशीय बनाने की वकालत की और फिर ऐसा ही हुआ। इसकी अनुशंसा प्राय: सभी समीतियों ने की थी। अब तो पूरे भारत में फोटो पहचान पत्र बनाने का कार्य पूरा हो चुका है।
• अस्सी के दशक में मतदान की उम्र 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई, इससे मतदाताओं की संख्या में काफी बढ़ोतरी हूई है।
• जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 में संसोधन करके 15 मार्च 1989 से मतदान में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल शुरू करने की व्यवस्था की गई। हाल के आम चुनाव में पूरे भारत में ईवीएम के जरिये ही वोटिंग की गई।
• शांतिपूर्ण चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग ने चुनावों से पहले लोगों के हथियार नजदीकी पुलिस थाने में दर्ज कराने की परंपरा शुरू की।
• मतदान के दिन आयोग ने शराब की बिक्री पर पूर्णत: प्रतिबंध लगा दिया।
• उम्मीदवार अपने प्रचार में अंधाधुंध धन खर्च ना करें इसके लिए निर्वाचन आयोग ने चुनाव प्रचार संबंधी गतिविधियों की वीडियों रिकॉर्डिंग करवाना शुरू की है।
• चुनाव खर्च पर नजर रखने के लिए आयोग ने लेखा परीक्षकों को प्रेक्षक के रूप में नियुक्त करना शुरू किया है।
• जुलाई 1998 में निर्वाचन आयोग ने सिफारिश की थी कि जिन व्यक्तियों के खिलाफ अदालत आरोप पत्र दायर कर दे, उन्हें विधानमंडल या संसद का चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित कर दिया जाए।
• चुनाव आयोग ने उम्मीदवार के एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने पर, एिक्जट पोल और ओपिनियन पोल पर प्रतिबंध लगाने, राजनीतिक पार्टियों द्वारा अपनी आय और खर्च का अनिवार्य रूप से हिसाब रखने और उसकी लेखा परीक्षा कराने की भी सिफारिश की।
• चुनावों को पारदशीZ बनाने के लिए निर्वाचन आयोग ने यह आदेश जारी किया है कि चुनाव लड़ने वाले हर उम्मीदवार को अपनी नामजदगी के पर्चे के साथ शपथ पत्र में अपनी पित्न और आश्रितों की कुल चल और अचल संपत्ति और देनदारियों का विवरण, अपनी शिक्षा, योग्यता का विवरण और यदि कोई आपराधिक पृष्ठभूमी हो तो उसकी जानकारी और अपने खिलाफ दायर आपराधिक मामलों का विवरण देना होगा।
• सरकार ने मतदाता को पहचान पत्र देने के साथ-साथ जाली मतदान रोकने के लिए मतदाता सूचियों में मतदाता की तस्वीर लगाने की व्यवस्था की है। निर्वाचन आयोग के प्रेक्षकों की जांच के परिणामस्वरूप मतदाता सूचियों से लाखों मृतकों के नाम हटाए गए हैं और लाखों नए नाम शामिल किए गए हैं।
• दलबदल कानून 1985 में संसोधन कर इसे और कठोर बनाया गया है।
इसके अलावा भी कई छोटे किंतु महत्वपूर्ण चुनाव सुधार को अंजाम दिया गया है, जिन्हें इस शोध पत्र में सम्मिलित करना संभव नहीं है।
उन सुधारों और प्रस्तावित सुधार प्रस्ताव जो करीब पन्द्रह विषयों में हैं ,इसके आलावा भी करीब सात विषयों में चुनाव सुधार प्रस्ताव लंबित हैं उन विषयों की सूची और वर्णन भारत के चुनाव आयोग की वेबसाइट पर या इस लिंक पर जा का देख सकते हैं ।

आपकी सुविधा के लिए इस पोस्ट के साथ भी Proposed Indian Electoral Reforms नामक फाइल संलग्न है

हमारा प्रयास कैसा लगा इसे बताते रहे और कोई त्रुटी पे जाने पर अवश्य सूचित करें
Proposed Indian Electoral Reforms


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1 Response to भारतीय चुनाव सुधार

9:19 AM, September 15, 2009

महत्वपूर्ण आलेख । scribd फाइल का आभार । [Reply]

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