बदल कर फ़कीरों का हम भेस .........................

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ग़ालिब ने खूब कहा है ...........................

बदल कर फकीरों का हम भेस ग़ालिब,
तमाशा-ऐ-एहले करम देखते हैं .
ये दुनिया बड़ी अजीब है बाबू , यहाँ कोई आपकी सुनने वाला नही है , अगर खामोश रह गए तो समझो के सुब कुछ ख़तम।और अगर लोकतंत्र में रहना है तो राजनीति तो करनी ही होगी , और फ़िर योगेन्द्र यादव ने कहा भी है की राजनीति तो आज का युग धर्म है । ये बात सच है की जब-जब अच्छे काम की शुरुआत होती है परेशानियाँ हमेशा हमारा रास्ता रोकती है । मगर ये आदमी ही है जो बिना रुके आपना सफर तय करता है । हम हमेशा डर क्यों जातें हैं, जब ये बात तय है की एक दिन मौत आनी है। जब एक वक्त तय है मौत के लिए तो यूँ रोज - रोज मरना क्या । और माफ़ कीजिये , न हमे मौत का खोफ है न ही घुट-घुट के जीने की ख्वाहिश । ये बात तय है की पत्थर पिघल नही सकता पर हम बेकरार हैं आवाज के असर के लिए । कोई हमे हलके में न ले । हम अगर खामोश हैं तो इस वजह की हम लोगों की बात सुनना चाहते हैं पर इसका ये मतलब बिल्कुल नही की हम कुछ नही जानते । क्या हम सिर्फ़ कुछ मतलबी कारणों की वजह से पुरी जिंदगी के जशन को गम की दावत में बदल देते हैं ? उठो और उठके निजामे जहाँ बदल डालो । ये लेख किसी हादसे की भड़ास नही और न ही किसी नीद से जागे हुई डबडबाईआँखों का बयान । और आप लोगों को लगता है की यही जीना है तो इससे तो बेहतर के हम मर जायें यारों ।

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3 Response to बदल कर फ़कीरों का हम भेस .........................

4:58 PM, September 05, 2009

ये लेख किसी हादसे की भड़ास नही और न ही किसी नीद से जागे हुई डबडबाईआँखों का बयान ।"

हाँ, लगता है हमें भी । आभार । [Reply]

10:38 PM, September 07, 2009

imandari se jeena kaafi nahin hai. agli peedhi ke liye ek imaandar aur surakshit jagah bhi deni padegi. Rajniti yugdharm hai aur usse door rahne ki baat karne wale kisi ke bhartya sevak hain. [Reply]

3:23 PM, September 09, 2009

I will write my comment on two parts. Firstly on the structure, grammer nad approach of the piece and then on the content.

so, here i go.
hmmm...shabdo ka chunav aur vakyo ki sanrachna bhaut achhi hai..urdu ka prayog bhi behtar hai..the piece contains asthetic element but in a sense it tends to confuse the reader of common understanding. The message is not clear...althopugh i m able to percive it but i guess that it is going to be pretty confusing for others.
but after all this..i m happy about the use of urdu words and shayri..

NOW the content part:
Kuch vakya waqwai acche ban pade hai. ek sher se shuru karne ka irada hamesha hi dil ko chu pata hai. Vicharo mein bhatkav hai par vo to lekhakl ki purani aadat hai. marmsparshi vakya hai..har vakya apne mein khoobsurat aur pathak ke prati apne prayas mein puri sanjeedgi liye hue..par annt me wo koi ek arth samprethit nahi kar paa raha.

Kahir..ye galat nahi..because crativity and litrary writings are not only ment for reaching a conclusion or understanding. many times..they simply broaden our thinking process. Some pieces leave us with even more questions...as this one... [Reply]

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