लोकलज्जा भंग होने का प्रतीक है जरनैल का जूता

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बड़ा ही अहम सवाल है कि क्या जरनैल जैसे पत्रकारों का एक जूता भारतीय राजनीति की दिशा को बदल सकताहै? इस जूते के कई मायने हैं। एक तो ये कि क्या एक पत्रकार के लिए ऐसा करना ठीक है ? दूसरा ये कि क्या एकजुता भारतीय राजनीति में किसी की टिकट कटा सकता है। निसंदेह जरनैल के जूते ने भारतीय राजनीति, पत्रकारिता और ब्लागर्स के मध्य एक नई बहस को जन्म दिया है। लेकिन थोड़ा सा सापेक्ष होकर सोचें तो क्या यहसही नहीं है कि ये जरनैल के जूते का ही असर है कि सिक्ख दंगों के लिए दोषी टाइटलर और सज्जन के हाथ सेकांग्रेस की टिकट फिसल गई।
थोड़ा सा और गहरे में जाएं तो क्या ये भी सही नहीं है कि 60 साल के लोकतंत्र की हालत अब भी इस कदर कमजोर है कि एक पत्रकार का जूता इसमें हिलोरें पैदा कर सकता है। सवाल जरनैल के जूते से सज्जन और टाइटलर के टिकट काटकर जन भावनाओं के सम्मान का नहीं है (जैसा कांग्रेस कह रही है) यदि हिंदुस्तान के राजनीतिक दलों को जनभावनाओं की इतनी ही कदर है तो फिर दोषी ठहराए जाने के बावजूद सज्जन और टाइटलर आज इस मुकाम पर कैसे पहुंचे । यहाँ तो राजनीतिक पार्टियों का ये एक सूत्रीय ऐजेंडा है सत्ता सुख का भोग। चाहे उसके लिए उन्हें कुछ करना पड़े। इस आम चुनाव में कौनसा ऐसा मुद्दा है जो आम आदमी से सीधा जुड़ा है। यदि सिक्ख दंगों के लिए दोषी ठहराए जाने के बावजूद सज्जन और टाइटलर को टिकट मिल रही थी तो शर्म आना चाहिए हमारे लोकतंत्र के पुराधाओं को , हम बहस इस विषय पर कर रहे हैं कि जरनैल का चिंदबरम पर जूता उछालना कितना जायज है। हम ये नहीं जानना चाहते कि भारतीय राजनीति में ऐसे न जाने कितने टाइटलर और सज्जन हैं जिन्होंने अपनी पार्टी के फायदे के लिए क्या-क्या नहीं किया। इसीलिए तो अब लोकतंत्र में लोकलज्जा भंग हो रही है।
जरनैल का एक पत्रकार होते हुए चिदंबरम पर जूता उछालना इसी बात का प्रमाण है। चाहे कोई किसी पेशे में हो लेकिन सबसे पहले वह एक इंसान है। इंसान के भीतर उसके अपनी संवेदनाएं है। यदि जरनैल का मामला प्लांटेड नहीं हुआ तब तो ये पूरी राजनीतिक बिरादरी पर फेंका गया एक जुता है। यदि इस जूते ने कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी के निर्णय को प्रभावित किया है तब तो निश्चित रुप से जरनैल का कृत्य काबिले तारीफ है। इराक में जार्ज़बुश पर फेंके गए जैदी के जूते की इसीलिए वहॉं जय-जयकार हुई थी। दरअसल ये जूता नहीं जनभावनाओं का प्रतीक है।

अब आपके लिए भी ये एक जूता छोडे जा रहे हैं , मन चाहे पत्रकारों पर मारें, मन चाहे हमारी राजनीती पर मारें , या चाहें तो उस पर क्लिक करें और हमें गरिया दें या कमेन्ट दे दें


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5 Response to लोकलज्जा भंग होने का प्रतीक है जरनैल का जूता

10:40 PM, April 13, 2009

अब ये जूता हर उस आदमी पर पड़ेगा जो लोगों को गुमराह करने की कोशिश करेगा। [Reply]

6:58 AM, April 14, 2009

बेबस जनता के लिए जूता अब हथियार।
गलत तरीका है मगर जनता है लाचार।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com [Reply]

4:04 PM, April 14, 2009

योगेश जिसे आप महज जूता समझ रहे हैं दरअसल वह एक सड़ीगली व्यवस्था के प्रति आम आदमी का आक्रोश है मुझे तो लगता है जरनैल सिंह की हरकत सबसे शिष्ट तरीका है हामरे इन राजनेताओं को आईना दिखाने का। आप ने देखा नहीं केंद्रीय मंत्री ने कितनी बेशर्मी ेस टाइटलर को क्लीनचिट दिए जाने पर कहा था आईएम हैप्पी... [Reply]

5:03 PM, April 14, 2009

जी, लगता है आज जूता भी आक्रोश का प्रतीक हो गया है.

रामराम. [Reply]

1:56 PM, April 15, 2009

Bharat me aisa hoga hamane kabhi Socha bhi na tha lekin satyagrah ki ladai yaha tak pahuch gai.... Hamara Desh hamesha Naye-Naye Vishyo se puri Duniya me Chamkta raha hai lekin JOOTO ke karan hamare desh ka naam aa raha hai usse dhukh bhi ho raha hai..... aise hi likhte rahana..... Dear se comment ke liye SORRY......... Best of LUCK!
Jay Hind [Reply]

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