रिश्तों का पैकेज बनाता बाजार

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बात यहाँ भी बाजार की है। पैकेज की है। पैकेज किसी नौकरी का नहीं ही किसी पर्यटन स्थल के भ्रमण का। यहॉं पैकेज है रिश्ते का। पैकेज बिना प्रसव पी़डा के माँ बनने के दुस्साहस के लिए उकसाने वाली संस्कृति का। हो सकता है आप में से बहुत से लोगों के लिए यह कुछ नया हो लेकिन मेरे लिए बिल्कुल नया है।  मैं इसे रिश्तों में बाजार की दखलंदाजी मानता हूँ। वाकया यह है कि कुछ दिन पहले मेरे मित्र ने मुझे बताया कि उसने अपनी गर्भवती पत्नी के लिए भोपाल के ही एक निजी अस्पताल से 50 हजार रुपए का पैकेज ले लिया और टेंशन फ्री हो गया था। बच्चे को जन्म देने के हफ्ते भर बाद तक पत्नी ने तो बच्चे की नैप्पी बदली ही उसे दवा या दूध पिलाया। बच्चे के जन्म के बाद जब उसके दादा-दादी और नाना-नानी भोपाल आए तो उन्हें रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट तक लेने के लिए भी अस्पताल प्रबंधन के ही लोग गए, और उनके ठहरने और खाने का बंदोबस्त भी पैकेज में शामिल था। जाने के वक्त बाकायदा उन्हें नाती के जन्म का मोमेंटो भी अस्पताल प्रबंधन ने ही दिया
मेरा दोस्त अपनी छाती चौड़ी कर पत्नी की प्रसूती के इस पैकेज की तरफदारी कर रहा था। उसने बताया कि हफ्ते भर तक मेरी पत्नी की कंघी-चोटी और सारा श्रृंगार करने के लिए स्टॉफ मौजूद था। मैं उसकी बात और पैकेज की तारीफ चाहकर भी नहीं भूल पाता हूँ। सोचता हूँ कि ये क्या हो रहा है। सुना था कि माँ और बच्चे का भावनात्मक संबंध इतना मजबूत और शाश्वत इसीलिए होता है क्योंकि असहनीय प्रसव पी़डा के बाद जब मॉं बच्चे को जन्म देती है तो बच्चे का खिलखिलता चेहरा देख और उसकी किलकारियॉ सुनकर वह पी़डा माँ पल भर में भूल जाती है। माँ के स्तन का स्पर्श भर पाकर भूख से बिलखता बच्चा शांत हो जाता है। सोचता हूँ क्या यह पैकेज प्रसूती माँ और बच्चे के मध्य का तादात्म्य बरकरार रख पाएगी? जन्म के हफ्ते भर बाद तक बच्चे से जानबूझकर दूर रही माँ अपने बच्चे को उतना ही प्यार दे पाएगी? क्या यह मॉं और बच्चे के रिश्ते की नैसर्गिकता से छे़डछा़ड नहीं है? ऐसे में उस बच्चे के मन में अपनी माँ के प्रति प्रेम पल्लवन संभव है ! पैकेज से बच्चे तो पैदा हो सकते हैं लेकिन संस्कार नहीं।




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5 Response to रिश्तों का पैकेज बनाता बाजार

12:31 PM, February 26, 2010

रिश्तों को पैकेज बनाने के दोष हम हैं बाजार नहीं। बाजार तो महज माध्यम भर है। [Reply]

7:44 PM, February 26, 2010

सर बात ये है कि आपने जिस पैकेज का जिक्र किया वो हमारे लिए तो घातक हो सकता है मगर जिसने बाजार कि कोख से जन्म लिया है उसके लिए तो ये वरदान साबित होगा . असल में पूरी व्यवस्था इस पूंजीवादी देवता की आराधना कर रही है ओर जो लोग पैकेज लेने में असमर्थ है वे आधुनिक युग के दलित है जिन्हें इस देवता के मंदिर में जाने की मनाही है .दरअसल संस्कारों के वट वृक्ष में दीमक लगना काफी पहले से शुरू हा चुका है , अब ये पेड़ खोखले हो चुके है , और ग्लोबलवार्मिंग के इस दोर में इन्हें बचा पाना मुश्किल है [Reply]

8:12 PM, February 26, 2010

स्वयंवर .शादी....इमोशनल अत्याचार .स्पिल्ट विला ...बिग बॉस ........जाहिर है अब पैकेजिंग बदल रही है ..रियल्टी अब डिमांड में है तो उस ओर का मॉल इंडियन वर्ज़न में आएगा ही.... [Reply]

8:32 PM, February 26, 2010

सही कहा है आपने , रिश्ते लगातार अपना महत्व खोते जा रहे हैं, और कहें के बाज़ार चाहता ही नहीं के रिश्ते बने रहे ,
रिश्ते नहीं होंगे तो अधिक छोटे परिवार होंगे और हर छोटे परिवार के लिए बाजार अपना दामन खोल के बैठा है , ज्यादा ग्राहक ज्यादा फायदा
सचमुच संस्कारों के पेड़ अब खोखले हो चुके है , और इस ग्लोबलवार्मिंग के इस दोर में इन्हें बचा पाना बेहद मुश्किल है . [Reply]

11:24 PM, February 26, 2010

युरोप ओर अमेरिका की गंदगी तो हम जरुर अपनायेगे ना, अब इसे कुछ भी कहो [Reply]

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