जनता ने सांप्रदायिक ताकतों को पूरी तरह नकार दिया

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लोकसभा चुनाव के नए जनादेश पर मैंने देश के कुछ नए पुराने साहित्यकारों की राय ली एक ख़बर के लिए.......पेश है आप के लिए जैसी की तैसी


लोकसभा चुनाव में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) को जीत हासिल हुई है और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) तथा वाम दलों को करारी हार का सामना करना पड़ा है। इन चुनाव नतीजों को लेकर देश के कुछ वरिष्ठ और युवा साहित्यकारों का मानना है कि देश की जनता ने सांप्रदायिकता, जाति और क्षेत्रवाद की राजनीति करने वाली ताकतों व आपराधिक छवि वालों को साफ तौर पर खारिज कर दिया है।


वरिष्ठ साहित्यकारों के मुताबिक राजग जहां वास्तविक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने की बजाय भावनात्मक उभार पैदा करने की कोशिशों और भविष्य के लिए स्पष्ट नीतियों के अभाव के चलते पराजित हुआ, वहीं संप्रग की जीत उसकी नीतियों और मनमोहन सिंह की ईमानदार छवि का नतीजा है।


राजेंद्र यादव



क्या इस जनादेश को देश के सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में किसी परिवर्तन का द्योतक माना जा सकता है, यह पूछे जाने पर वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र यादव ने कहा कि ये चुनाव इस मायने में खास हैं कि इस बार जनता ने सांप्रदायिक ताकतों को पूरी तरह नकार दिया साथ ही उसने यह भी स्पष्ट किया कि छोटे और क्षेत्रीय दलों से उसका मोहभंग हो रहा है।


उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पुनरोदय के बारे में उन्होंने कहा कि जनता ने मायावती के भ्रष्ट और आपराधिक शासन के खिलाफ जनादेश दिया है, जबकि देश के अन्य हिस्सों की ही भांति कांग्रेस की युवाओं को आगे लाने की रणनीति भी उत्तर प्रदेश में कारगर साबित हुई।


भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की हार पर उन्होंने कहा कि भविष्य के लिए कोई स्पष्ट योजना न होना उसकी हार का प्रमुख कारण रहा। वाम दलों की खराब स्थिति के बारे में उन्होंने कहा कि वास्तविकता को न समझ पाने और आपसी बिखराव की वजह से उनकी यह दुर्दशा हुई।


प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव और वरिष्ठ समालोचक डॉ. कमला प्रसाद कहना है कि इन चुनावों में जनता ने छिपे हुए एजेंडे लेकर चलने वाले दलों को किनारे लगा दिया। इसके अलावा यह जनादेश बाहुबलियों, धनबलियों और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और समाजवादी पार्टी (सपा) जैसे व्यक्ति केंद्रित दलों के भी खिलाफ रहा।


कांग्रेस की स्थिति में सुधार पर उनका स्पष्ट मानना है कि इसमें कांग्रेस की कोई भूमिका नहीं रही बल्कि उसे अन्य दलों के खिलाफ लोगों की नाराजगी का फायदा मिला। उनके मुताबिक उत्तर प्रदेश में मायावती से नाराज सवर्णो, दलितों और मुस्लिम समुदाय के वोट इस बार कांग्रेस को मिले।


वाम दलों की पराजय पर कमला प्रसाद ने कहा कि संप्रग सरकार द्वारा किए गए सभी अच्छे कामों में वाम दल शरीक रहे, लेकिन ऐन चुनाव के पहले सरकार से समर्थन वापस लेने से वह इन कामों का लाभ नहीं उठा सके। इसके अतिरिक्त उन्हें परमाणु करार के मुद्दे पर भाजपा के साथ खड़े होते दिखने का भी नुकसान हुआ।


कृष्णमोहन



युवा आलोचक कृष्णमोहन ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के उभार पर कहा कि मुलायम शासन से त्रस्त जनता ने मायावती को जनादेश दिया था लेकिन उसका बहुत जल्दी उनसे भी मोहभंग हो गया और राज्य में तीसरे विकल्प के रूप मे कांग्रेस को उभने का मौका मिल गया।


वामदलों की करारी पराजय पर उन्होंने कहा कि नंदीग्राम और सिंगुर जैसे प्रकरणों ने वाम दलों की छवि को भारी क्षति पहुंचाई। इसके अलावा सैद्धांतिक विचलन भी उनकी हार का कारण बना। उन्हें दोहरेपन का खामियाजा भी भुगतना पड़ा। दरअसल वह खुद उन कमियों का शिकार हो गए जिनके लिए वह अन्य दलों की आलोचना किया करते थे।


भाजपा और राजग की हार पर उन्होंने कहा कि उसने वास्तविक मौजूदा मुद्दों की बजाय लोगों का भावनात्मक दोहन करने की नीति अपनाई जो अंतत: उनके लिए नुकसानदेह साबित हुई। उन्होंने कहा कि आतंकवाद एक बड़ा मुद्दा है जिस पर राष्ट्रीय बहस छेड़ी जा सकती थी लेकिन भाजपा अफजल की फांसी और वरुण गांधी के बयानों पर ही उलझी रह गई।


ज्ञानपीठ युवा लेखन पुरस्कार से सम्मानित युवा किस्सागो चंदन पांडेय का कहना है कि इन चुनावों से राष्ट्रीय स्तर पर तो कोई सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव परिलक्षित नहीं होते लेकिन फिर भी इस बार लोगों ने जातिवाद, बाहुबल और ब्लैकमेलिंग की राजनीति को खारिज किया है जो अपने आप में एक बड़ा परिवर्तन है ।


वाम दलों की स्थिति को चंदन उनकी हार न मानते हुए कहते हैं कि आम तौर पर उनके वोटों का प्रतिशत इसके आसपास ही रहता है लेकिन उनकी सीटों में जो कमी आई वह स्थानीय मुद्दों पर विफलता के कारण आई।


राजग की हार पर उन्होंने कहा कि उनके पास वास्तव में मुद्दों का अभाव था क्योंकि उन्हें अच्छी तरह पता था कि बेरोजगारी के वैश्विक कारण है और यह स्थानीय मुद्दा नहीं बन सकता। इसके अलावा ठोस आर्थिक नीतियों के अभाव में उन्हें पता था कि वह महंगाई और मंदी को मुद्दा नहीं बना सकते क्योंकि उनके पास खुद इससे निपटने की कोई योजना नहीं थी।

चंदन ने देश के मीडिया जगत को दक्षिणपंथी रुझान वाला करार देते हुए कहा कि यह मीडिया ही था जो राजग को लगातार मुकाबले में बता रहा था।


युवा कथा लेखिका वंदना राग का मानना है कि इन चुनावों में भाषाई विद्रूपता को अपनाने वाले लोगों की पराजय हुई है और जनता ऐसी छोटी बातों से ऊपर उठी है। उन्होंने कहा कि बुढ़िया और गुड़िया जैसे निचले स्तर के संबोधनों के प्रयोग ने लोगों को यह जता दिया कि देश के बड़े नेता बुजुर्गो और महिलाओं को कितना सम्मान देते हैं।


वाम दलों की हार पर उन्होंने कहा कि नंदीग्राम व सिंगुर जैसे मुद्दों ने उसे नुकसान तो पहुंचाया ही साथ ही जनता ने भी सरकार का साथ छोड़ने के बाद उसे विकास विरोधी मान लिया।

And here is the rest of it.

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9 Response to जनता ने सांप्रदायिक ताकतों को पूरी तरह नकार दिया

8:48 PM, May 19, 2009

किसी भी साम्यवादी दल का प्राथमिक कार्य दल का राजनैतिक कार्यक्रम बनाना और उस का जनता के बीच प्रचार कर जनता को गोलबंद करना है। लेकिन भारतीय वामपंथ जिस ने इन चुनावों में भाग लिया इस काम से बहुत दूर जा चुका है। आज सीपीएम के कैडर को पार्टी के कार्यक्रम का पता नहीं और सीपीआई के कैडर को भी नहीं। तो ऐसे दलों को हानि तो होनी ही थी। इन दलों में आंतरिक जनतंत्र भी बहुत कमजोर हो गया है यह दूसरा कारण है। [Reply]

10:09 PM, May 19, 2009

साहित्यकारॊं नें जो आधा-अधूरा कहा उससे उनकी वरिष्ठता और प्रतिबद्धता दोनों का पता लगता है। अच्छी बात तो शीर्षक में थी ‘जनता नें साम्प्रदायिक शक्त्तियों को पूरी तरह नकार दिया’ जिसमें मार्क्स सम्प्रदाय को भी आपने सम्मिलित कर, वास्तविकता से परिचित करा दिया। [Reply]

10:52 AM, May 20, 2009

मुझे समझ में नहीं आता की दक्षिणपंथ के खिलाफ कही गयी बातों का जवाब वामपंथ या उससे जुड़े विचारों की बुराई में कहाँ मिलता है. हम अपने देश के वामपंथ से इतर होकर सोचें तो मुझे नहीं लगता की उसमें कोई बुराई है आखिर समता की बात में कोई बुराई कैसे कैसे सकती है..यह भी सोचें की क्या ऊपर कही गयी बातें एक दम गलत हैं. या फिर ये की सारे बड़े आलोचक साहित्यकार मार्क्स की और क्यों आकर्षित हैं... मैं इस पोस्ट के माध्यम से ब्लॉग पर एक खुली बहस छेड़ना चाहता हूँ और ये भी चाहता हूँ की सुधी ब्लोगर पिछली पोस्ट में वामपंथी साहित्यकारों द्वारा उठाये गए सवालों का जवाब दें. [Reply]

11:21 PM, May 21, 2009

संदीप जी,
राजेंद्र जी ने कहा कि जनता ने सांप्रदायिक ताकतों को नकार दिया, लेकिन मैं उनका ध्‍यान इन आंकड़ों की ओर आकृष्‍ट करना चाहूंगा कि बहुमत में आने वाली सरकार को भारत की कुल आबादी का दस से बारह प्रतिशत वोट ही मिलता है, ऐसे में हम कैसे कह सकते हैं कि पूरी जनता ने सांप्रदायिक ताकतों को नकार दिया, वैसे हमें यह नहीं भूल जाना चाहिए कि जरूरत पड़ने पर यही कांग्रेस धर्म की राजनीति के खेल में पीछे नहीं रही है, चाहे राम मंदिर का ताला खुलवाना हो या पंजाब में खालिस्‍तानियों के जन्‍म की कहानी।
वैसे सांप्रदायिक ताकतों को चुनाव में नकार देने से कुछ होने वाला नहीं है, फासिस्‍टों के खिलाफ जनता को एकजुट करने के काम को छोड़ कर चुनाव में धर्मनिरपेक्षता का राग अलापने से भी कुछ नहीं होगा।
और सारी दुनिया के आलोचक भी मार्क्‍स की तरफ आकृष्‍ट हो जाएं तो भी जनता को जागृत और गोलबंद किए बिना फासीवाद का बाल भी बांका नहीं होने वाला....
फिर भी, आपने सार्थक बहस छेड़ने का प्रयास किया, उसकी सराहना की जानी चाहिए। [Reply]

5:12 PM, May 22, 2009

सांप्रदायिकता होती क्या है? [Reply]

5:31 PM, May 22, 2009

मुझे तो इन चुनावों में जनता समझदार होती नज़र आई, किस तरह बिना मुद्दों के प्रचारित चुनाव में भी एक बड़ा मुद्दा साम्प्रदायिकता अपने आप ही बहुत कुछ हद तक हल होता नज़र आया
वाम दलों पर तरस आता है क्योंकि सबसे मजबूत विचारधारा वाली पार्टी , जब सत्ता में आना अपना लक्ष्य बना लेती है ,और विचार धारा को समझाने का कार्य छोड़ देती है तो क्या उम्मीद करें उससे, वे भी मेहनत नहीं करना चाहते नए लोगों को अपनी बात बैठकर के समझाने की .
[Reply]

5:41 PM, May 22, 2009

वाम दलों की भी अपनी मजबूरियां हैं। भारतीय वामपंथ सही अर्थों में माक्र्स के विचारों के पोषक हैं भी नहीं लेकिन जो कुछ भी वो हैं उनकी अनुपस्थिति का असर इसबार दिखेगा। इस भीषण मंदी में हमारे बैंक और कुछ सरकारी कंपनियां बची हैं निजीकरण से तो दोस्तों वाम का एहसान मानना होगा [Reply]

12:07 PM, May 23, 2009

यूँ तो साम्प्रदायिकता व्यापक अर्थों वाला शब्द है लेकिन थोड़ी देर के लिए अगर सांप्रदायिकता के किताबी अर्थों में न जाएं तो सांप्रदायिकता खासकर भारतीय उपमहाद्वीप में सांप्रदायिकता दरअसल किसी धर्म या संप्रदाय विशेश के प्रति आस्था की चरम विकृत स्थिति है। जहां आराधक या उपासक विशेश अपने संप्रदाय या धर्म से इतर हर उपासना को न सिर्फ नकारात्मक रवैये से देखता है बल्कि उसे खारिज करता हुआ उसका उन्मूलन करने का भी प्रयास करता है............ [Reply]

5:19 PM, March 19, 2010

भारत में बिन samprdayik होने का मतलब हे मुस्लिम त्रुश्टी करण करना और नरेंद्र मोदी या भाजपा का विरोध करना अगर ये दोनों में से किसी एक ची आप करते हे तो आप सेकुलर हे और आप नहीं करते तो आप कट्टर हिन्दू आंतकवादी हे !!! शायद आप जानते होगे के भारत में संप्रदाय गाँधी की दें हे अगर खिलाफत आन्दोलन शरू हो गया वहा से मुस्लिम त्रुस्टी करण सुरु हुवा और जिन्नाह कांग्रेस से लिंग में चले गए तब भी जिन्नाह मुस्लिम नहीं हे वो डुक्कर खता हे मास खता मदिरा पिता ये नमाज अदा नहीं करता हे ये निति आप सेकुलर की देन हे अगर जिनः गाँधी की तरह बिरला ,बजाज ,टाटा और अन्य कपडे के मिलरो की दलाली करता तो वो भी आज सेकुलर और राष्ट्र पिता बन गया होता !!! जनता को उलू बनाओ और राजनीती खेलो !!! और अगर जानकारी चाहिए तो .....

raju.odedra1@gmail.com
raj.odedra999@gmail.com [Reply]

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