जानलेवा खेल
जाने किस मूड में भेजे गए उस इमेल को
सुबह संभलने के बाद उसने ख़ारिज कर दिया है
ये जिन्दगी है
लव आज कल नहीं
वह कहती है
मैं कहना चाहता हूँ की जिन्दगी
राजश्री बैनर का सिनेमा भी तो नहीं
प्यार चाहे मुख़्तसर सा हो या लम्बा
उससे अपरिचित हो पाना बस का नहीं
चाहे वो शाहिद करीना हों या मैं और वो
तुम शादी कर लो
उसने प्रक्टिकल सलाह दी थी
उंहू...
पहले तुम मैंने कहा था
हमारा क्या होगा
ये सवाल हमारे प्यार करने की ताकत छीन रहा था
हमने अपनी आंखों में आशंकाओं के कांटे उगा लिए थे
आकाश में उड़ती चील की तरह कोई हम पर निगाहें गडाए था
मेरे लिए अब उसे प्यार करने से ज्यादा जरूरी
उस चील के पंख नोच देना हो गया था
लेकिन मैं कुछ भी साबित नहीं करना चाहता था
न अपने लिए न उसके लिए
मुझे अब इंतज़ार था
शायद किसी दिन वो वह सब कह देगी
मैं शीशे के सामने खड़ा होकर अभिनय करता
की कैसे चौकना होगा उस क्षण
ताकि उसे ये न लगे की
अप्रत्याशित नहीं ये सब मेरे लिए
हर रोज जब वो मुझसे मिलती
मेरी आँखों में एक उम्मीद होती
लेकिन वह चुप रही
जैसे की उसे पता चल गया था सारा खेल
ये जानलेवा खेल
बर्दाश्त के बाहर हो रहा है
उम्मीद भी अँधा कर सकती है
ये जान लेने के बाद मेरी घबराहट बढ़ गयी है...
(अधूरी...)
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अधिनायक

इस गणतंत्र दिवस पर मेरे प्रिय कवि रघुवीर सहाय की कविता अधिनायक आप लोगों के लिए
वह भारत-भाग्य-विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है।
मखमल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चंवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है।
पूरब-पश्चिम से आते
हैं नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा,
उनकेतमगे कौन लगाता है।
कौन-कौन है वह जन-गण-मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है
तीस मिनट का वजन कितना होता है...
यह जानकारी क्या रूह को कंपा देने के लिए काफी नहीं है कि देश में औसतन हर तीस मिनट पर एक किसान आत्महत्या कर रहा है। तीस मिनट कितना समय होता है? लगभग उतना, जितना मैं शायद अक्सर अपने दोस्त से मोबाइल पर बात करने में बिता देता हूं या फिर आफिस की कैंटीन में चाय पीते हुए... वो तीस मिनट जिसमें एक किसान आत्महत्या कर लेता है या फिर उसके आसपास के कुछ और मिनट, कितने भारी होते होंगे उस एक शख्स के लिए। क्या उस समय उसके दिमाग पर पड़ रहे बोझ के वजन को मापने के लिए कोई पैमाना है?
मौत के बारे में आंकड़ों में बात करना चीजों को थोड़ा आसान कर देता है। जैसे हैती में भूकंप से लाखों मरे, मुंबई हमले में 218 या फिर देश में 2008 में 16196 किसानों ने आत्महत्या की। ऐसा लगता है यह किसी प्लाज्मा टीवी के निहायत किफायती माडल की कीमत है 16196 रुपये मात्र। दरअसल यह अश्लील आंकड़ा भी अखबार के उसी पन्ने पर छपा है जिसमें गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर सोनी के लैपटाप पर 12000 रुपये की छूट का विज्ञापन है। ये अखबार वालों को क्या होता जा रहा है?
किसी को ऐसा भी लग सकता है कि चलो देश की आबादी तो डेढ़ अरब पहुंच रही है 16000 मर भी गए तो क्या फर्क पड़ता है। छुट्टी करो यार.
आंकड़ों से थोड़ा और खेला जाए, हूं... लीजिए जनाब 1997 से अब तक देश में तकरीबन 2 लाख किसान आत्महत्या कर चुके। बिलकुल ठीक ठीक गिनें तो 199,132 । 2 लाख यह संख्या किस जुबानी मुहावरे के करीब है???? हां याद आया 2 लाख यानी टाटा की दो लखटकिया कारें। अकेले महाराष्ट्र में बीते 12 सालों में सर्वाधिक 41,404 किसानों ने आत्महत्या की है यह तो संख्या तो एक हीरोहोंडा स्प्लेंडर मोटरसाइकिल की कीमत से भी कम है। क्या यार ??? इन किसानों को हुआ क्या है कोई समझाओ भाई!
(आंकड़े नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो और हिन्दू में प्रकाशित पी साईनाथ के लेख से)T
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अंतिम इच्छा
सद्दाम हुसैन को /
फांसी पर लटका दिया गया /
और ठीक उस वक्त /
जब सद्दाम को /
फांसी दी जा रही थी /
शान्ति का मसीहा /
जोर्ज बुश /
खर्राटे भर रहा था /
अपनी आरामगाह में /
अमन और चैन /
सुनिश्चित करने के बाद /
वो डूबा हुआ था /
हसीं सपनों में /
जहाँ मौजूद होंगी /
दजला और फरात/
जलक्रीडा के अनेक साधनों में /
उनकी नवीनतम पहुँच /
याकि वो खुद /
बग़दाद के बाज़ार में /
अपनी बंदूकों के साथ /
सड़क के किनारे /
संसार के सबसे शक्तिशाली /
लोकतान्त्रिक राजा की तरफ से /
शेष विश्व को यह था /
बकरीद और नववर्ष /
का तोहफा... /
उसकी वैश्विक चिंताओं /
और करुना का नमूना /
जोर्ज डब्ल्यू बुश /
इस धरती का सबसे /
नया भगवान् /
पूछ रहा है... /
हमारी अंतिम इच्छा
(यह कविता मैंने ३० दिसंबर २००६ को लिखी थी जिस दिन सदाम हुसैन को फांसी दी गयी थी)
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जीवन का सबसे बड़ा सत्य क्या है, और क्या सभी जानने की चेष्ठा करते हैं ?
जीवन का सत्य ढूँढने चले सेंकडो महा पुरूष अंत में इश्वर को पाते हैं, सचमुच क्या इश्वर जीवन है? या जीवन का सत्य है? या वे सिर्फ़ इश्वर के बहाने जीवन के किसी रस को पा जाते हैं और अपने में मस्त जीवन यापन करते हैं ।
खैर जीवन का सत्य मेरे लिए महत्त्वपूर्ण ना होकर जीवन महत्वपूर्ण है, और विचारों की एक श्रृंख्ला एक 70MM की रील के समान घूम रही है, कहीं आपको प्रश्न सुझाती है कहीं उत्तर, और कहीं आप उन प्रश्नों को भूल जाते हैं, तो कहीं जूझ जाते हैं । महत्त्व है तो सिर्फ़ परिवर्तन का तो बस बने रहें परिवर्तन के साथ .
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सफ़र स्वात से सुवास्तु तक
इधर-उधर जाने के लिए पहाडों को पार करने वाले दर्रे हैं । सारा इलाका हरा भरा है । शम्स उल-उलमा मौलाना मुहम्मद हुसैन "आज़ाद" स्वात की भूमि के बारे में लिखते हैं -"मेरे दोस्तों, यह पर्वतस्थली ऐसी बेढंगी है, की जिन लोगों ने इधर के सफर किए हैं, वही वहां की मुश्किलों को जानते हैं । अंजानो की समझ में वे नही आती । जब पहाडों के भीतर घुसते हैं, तो पहले पहाड़, मनो ज़मीन थोडी थोडी ऊपर चलती हुई मालूम होती है । फ़िर दूर बादलों सा मालूम होता है, जो सामने दाहिने से बाएँ तक बराबर छाए हुए हैं । वह उठता चला आता है । ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते चले जाओ, छोटे छोटे टीलों की पंक्तियाँ प्रकट होती हैं । इनके बीच से घुसकर आगे बढ़ो, तो उनसे ऊँची-ऊँची पहाडियां शुरू होती हैं । एक पांती को लाँघ थोडी दूर चढ़ता हुआ मैदान है, फ़िर वाही पांती आ गई ।
यहाँ दो पहाड़ बीच से फटे हुए ( दर्रा ) है, जिनके बीच में से निकलना पड़ता है, अथवा किसे पहाड़ की पीठ पर से चदते हुए ऊपर होकर पार निकलना पड़ता है । चढाई और उतराई में, पहाड़ की धारों पर दोनों और गहरे गहरे गड्डे दिखलाई पड़ते हैं, जिन्हें देखने दिल नही चाहता । जरा पाँव बहका और गए, पातळ से पहले ठिकाना नही मिल सकता । कहीं मैदान आता, कहीं कोस दो कोस जिस तरह छाडे थे उसी तरह उतरना पड़ता, कहीं बराबर चढ़ते गए । रास्ते में जगह जगह दायें-बाएँ दर्रे (घाटे, डांडे) आते हैं, कहीं दूसरी तरफ़ रास्ता जाता है । इन दर्रों के भीतर कोसों तक लगातार आदमियों की बस्ती है, जिनका हाल किसी को मालूम नही । कहीं दो पहाडों के बीच मैं कोसों तक गली गली चले जाते हैं । चढाई ( सराबाला) , उतरे (सरोशेब), डांडा (कमरेकोह)
अफगानों को पख्तून भी कहते हैं, जिन्ही को ऋग्वेदिक आर्य पख्त कहते थे ।
एक पाठक की टिपण्णी : पोस्ट खंडन : नवाबों की होली सोने की पिचकारी से
इस पर हमारे एक पाठक फुर्सत ने आपत्ति दर्ज कराई है और अपना पक्ष एक टिपण्णी के मध्यम से रखा है । कुछ पुराने लोगों से और सीहोर जिले से जुड़े वरिष्ठ पत्रकारों से बात करने के बाद हमने पाया उनकी दी हुई जानकारी काफी हद तक सही है , इसीलिए उसे ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहे हैं । हम अपने पाठकों का धन्यवाद करते हैं जो संवाद में विश्वास करते हैं , और अपने विचार इस तरह अग्रेषित करते हैं ।नवाब हमीदुल्ला खान इनके साथ होली मनाने के बाद सीहोर होली मनाने जाया करते थे। जो उस वक्त रियासत का एक हिस्सा हुआ करता था,सीहोर के कई हिस्सों में यहाँ से शुरू हुई परम्परा को आज भी पूरा किया जाता है और दूसरे दिन भी होली मनाई जाती है।
आपकी गलत व भ्रामक जानकारी में सुधार कर लीजिये, नवाब के कारण तो होली संकट में है
नवाब हमीदुल्ला को होली का शोक था इसमें हमें इंकार नहीं है, वह सोने की पिचकारियों से होली खेलते थे इससे भी हमें कोई सरोकार नहीं ।
लेकिन नवाब साहब की सरपरस्ती कसीदे घड़ने वालों ने जो यह लिख दिया है कि नवाब साहब दूसरे दिन होली खेलने सीहोर जाते थे और आज भी इस कारण सीहोर में दूसरे दिन होली खेलने की परम्परा कायम है, वह लोग अपनी इस नाजायज भूल में सुधार कर लें ।
अव्वल तो इतिहास लिखने वाले को संस्कृति व परम्पराओं का भी ज्ञान होना चाहिये लेकिन जो सिर्फ साहब जी हजूरी करने के लिये ही लिख रहा हो उससे ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती ।
तथैव – यह समझ लें की होली कोई एक दिन का त्यौहार नहीं है बल्कि पूरे 5 दिन का त्यौहार तो तिथियों के मान से ही है। यह भी बता देना उचित है कि सीहोर में होली भोपाल से कई गुना ज्यादा उत्साह, उमंग व अपनी अनेक परम्पराओं के साथ मनाई जाती है, इसमें किसी राजा या नवाब की कोई देन नहीं है ।
होली की यह अतिसामान्य जानकारी भी वह कथित इतिहासकार जान लें कि होली की पड़वा एकम को ‘‘गमी’’ की होली रहती है, पूरे देश में ही गमी की होली मनाई जाती है, सीहोर में आज भी पहले दिन गमी की होली पर विभिन्न जाति समाज के लोग अपनी-अपनी ‘’गैर’’ निकालते हैं, और उन घरों में जाते हैं जहां बीते वर्ष गमी अर्थात किसी की मृत्यु हुई हो ।
हिन्दु धर्म में यह परम्परा बता देना उचित होगा कि गमी वाले घरों के लिये सारे त्यौहार सामान्य रहते हैं लेकिन यदि वर्ष के बीच में होली आ जाये तो होली की एकम को जब समाज की गैर गमी वाले घर के लोगों को बाहर निकालकर गम भूल जाने की समझाईश देती तो इस दिन बाद आगामी सारे त्यौहार वह परिवार मना सकता है ।
मूल बात यह है कि सीहोर में ही नहीं बल्कि आसपास क्षेत्रों में पहले दिन गमी की होली मनती है और दूसरे ऐसी शानदार होली मनती है कि वह लोग जिन्हे होली खेलने का शोक हो, वह स्वयं ही सीहोर खींचे चले आते है। सीहोर में पूर्व वर्षों में 5 दिन की होली मनती थी, कथित इतिहासकार सोचे की क्या बाकी के 3 दिन क्या नवाब की याद में होली मनती होगी।
इसे नोट कर लें – कि अभी 9-10 वर्ष वर्ष 2000 के पूर्व तक सीहोर से लगी हुई आष्टा तहसील में तो होली की धूम इतनी जबर्दस्त रहती थी कि पूरे 5 दिन तक बाजार बंद रहता था प्रतिदिन होली होती थी, लेकिन अभी 10 वर्ष पूर्व बैठक करके निर्णय लिया गया कि 5 दिन होली शहर के अलग-अलग हिस्सों में बांटकर होगी, अब वहां भी जिसे होली पसंद होती है वह पूराने आष्टा नगर को छोड़ जहां होली हो रही होती है उस मोहल्ले क्षेत्र में चला जाता है, ठीक वैसे ही है जैसे नवाब सीहोर आ जाते थे ।
यदि नवाब सीहोर में आकर होली खेलता था तो यही कहा जाना चाहिये कि नवाब होली खेलने के शोक में सीहोर में होली खेलने चले जाया करते थे, उनके कारण सीहोर में होली होती यह कहना ना सिर्फ गलत, भ्रामक, असत्य है बल्कि इतिहास के साथ छेड़छाड़ भी है ।
इन्ही कथित इतिहासकारों के कारण आज सीहोर में दूसरे दिन की होली संकट के दौर से गुजर रही है, क्योंकि यहां पहले दिन गमी की होली का इतना महत्व है कि इस दिन सामान्य कम लोग होली खेलते हैं लेकिन दूसरे दिन हर हुरियारा सड़क पर होता है, ऐसे में प्रशासन, पुलिस बल हर कोई यह चाहता है कि होली की मस्ती कम हो, प्रशासन व पुलिस बल लगातार होली के सप्ताह भर पहले से यह कहना शुरु कर देता है कि सीहोर के लोग आज भी नवाब की याद में होली खेल रहे हैं, एक नया सिपाही भी यहां आता है जिसे सीहोर का इतिहास नहीं मालूम हो, वह तक नई उम्र के हुरियारों से कहता है कि नवाब खेलते आते थे इसलिये यहां होली हो रही है, कुछ नये लोग जिन्हे होली से घबराहट होती है वह भी खुद को बचाने के लिये कह देते हैं कि हम नवाब की होली क्यों खेलें
मूर्ख इतिहासकारों के कारण आज आम स्वाभिमानी सीहोर का नागरिक पारम्परिक होली खेलते हुए परेशानी महसूस करता है, उसे चारों और होली के विरोधियों द्वारा यह स्वर सुनाई देता है कि नवाब की होली खेल रहे हो।
क्षमा प्रार्थना सहित – निवेदन है कि आपके चिट्ठे पर सरपरस्ती में लिखा गया उक्त लेख व विषय उचित है लेकिन उसमें यह उल्लेख किया जाना गलत है कि सीहोर के कई हिस्सो मे आज भी वह परम्परा निभाई जाती है........ ।
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चाँदी के वरक में लपटा भारत
उठो और उठ के निज़ामे जहाँ बदल डालो ,
ये आसमान ये ज़मीन ये मकां बदल डालो ।
ये बिजलियाँ हैं पुरानी ये बिजलियाँ फूंको ,
ये आशियाँ है कदिम आशियाँ बदल डालो ।
गुलों के रंग मैं आग पंखुड़ी में शराब ,
कुछ इस तरह रविशे गुलसिताँ बदल डालो ।
मिज़ाज़-ए-काफिला बदला तो क्या कमाल किया ,
मिज़ाज़-ए-रहबारे कारवाँ बदल डालो ।
'हयात' कोई कहानी नही हक़ीकत है,
इस एक लफ्ज़ से कुल दास्ताँ बदल डालो ।
दोस्त का आभार आपके द्वार
जब हम उस धर्मशाला के द्वार पर पहुंचे जहां से हमारी शादी हो रही थी, गाना शुरू हुआ कि ‘बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है‘ उसे सुनते ही पता नहीं क्यों आंखे नम हो गई और लगा कि पहली बार पूरी शादी में अपन को किसी ने सीरियसली लिया है। धर्मशाला की छत पर खड़ी कुछ युवतियां हम पर फूल भी बरसाने लगी सचमुच हम स्वयंबर के अकेले राजकुमार थे।
तभी से मेरे मन में ख्याल आया था कि इन गीतों के गीतकारों के प्रति किसी तरह आभार प्रकट करूंगा। मैंने अपने मित्र की बात को समझते हुए यह पोस्ट लिखी क्योंकि सच में करोड़ों लोगों की षादियों में बिना रायल्टी के बजे इन गीतों ने उत्सव के पलों को यादगार जरूर बनाया है। लगभग तीन पीढ़ी की उम्र हो चुकी इन गीतों में आज भी वही मजा है। भाषाई बाधाओं को तोड़ते हुए ये गीत संपूर्ण भारत के हिस्सों में शादी के मौके पर साथी रहे हैं और हम सब की और से इन गीतों के गीतकार को बहुत-बहुत आभार।
सुनी और आनंद लीजिये
चुनाव तक हमऊ दलित बना दई
होली पर बढ़ती हुडदंग और चिंता की फ्रिक्वेंसी
हिन्दुस्तान के कुछेक इलाकों की होली के बारे में जानकर कम से कम इतना कहने की स्थिति में तो हैं कि होली एक विशिष्ट पर्व है, रागद्वेष से मुक्त होकर उल्लास और उमंग में डूब जाने का। लेकिन जब हम खुद के भीतर झॉंकते हैं तो पाते हैं कि बदलते दौर के साथ हमने वो सब खो दिया है जिसके मायने हम खोजते रहते हैं। सब कुछ बदल गया है। इतना बदल गया है कि थोड़ी बहुत कोशिश से हम उस स्थिति को फिर वापस नहीं पा सकते। अब तो होली आई तो चंदे के नाम पर हत्या, शराब के नशे में दुर्घटना और ऐसी ही दर्ज़नों खबरों से अखबार रंगे रहते हैं। क्या वाकई मस्ती के इस पर्व में हमें इतना मस्त होने की जरुरत है कि अपनी सुधबुध ही खो जाएं। अभी बीते चार दिनों से भोपाल में होली की तैयारियों को समझने की कोशिश कर रहा हूँ । होली क्या आई। पुलिस के लिए तो जैसे आफत आ गई। पुलिस महकमा हर दिन बैठकें कर होली पर सांप्रदायिक सदभाव बिगड़ने से रोकने की कोशिशों में जुटा हुआ है। ईदमिलादुन्नबी का जुलूस क्या निकला राजधानी की सड़कें छावनी में तब्दील हो गई। पुलिस का भय है कि इसी दिन रात में होलिका दहन है। स्थिति बिगड़ सकती है। दरअसल ऊपर लिखी पूरी बात को मैं यहॉं सम्बद्ध करना चाहता हूँ कि दो धर्मों के परस्पर त्यौहार किसी स्थिति बिगड़ने का प्रतीक कैसे बने। हमने ऐसा क्या कर दिया कि अब प्रशासन को इस बात की चिंता करनी पड़ रही है कि स्थिति बिगड़ सकती है। इसके लिए हमें खुद के भीतर झॉंकना होगा। हमने चीजों के मायने खो दिए हैं। चीजों को अपनी सुविधा के लिहाज से डायवर्ट कर दिया है। हमें लगा कि मस्ती बिना शराब की नहीं हो सकती। बिना हुडदंग के नहीं हो सकती। बिना जबरदस्ती किए होली का मजा फीका पड़ जाएगा। जब किसी पर्व पर इतने लांछन हो तो जाहिर सी बात है कि उसमें उमंग और उल्लास की फ्रिक्वेंसी कम और हुडदंग और चिंता की फ्रिक्वेंसी ज्यादा होगी।
होलिका दहन के साथ ही कलम और संगीत की जुगलबंदी की यह होली अब खत्म हुई। इस श्रृंखला में हमने हर दिन एक नई होली देखी और होली से पहले होली के उमंग का अहसास किया। हमारा प्रयास आपको कैसा लगा, इसमें कहॉं कमी रही और आगे हम कैसे बेहतर कर सकते हैं। अपने सुझावों से अवगत कराएं तो सही मायने में हमारा प्रयास अपनी परिणति की ओर पहला कदम साबित होगा। आप सभी को होली की शुभकामनाओं के साथ सरपरस्त .....
नवाबों की होली सोने की पिचकारी से
प्रस्तुति -फैजान सिद्दीकी
भोपाल गंगा जमुनी तहजीब का शहर है, यहाँ सभी धर्मों के त्यौहार मिलजुल कर मनाने की रिवायत रही है। इस परम्परा की शुरूआत नवाबी दौर से हुई। रंगों और उल्लास के पर्व होली को मनाने का इतिहास भी शहर में अनौखा रहा है। नवाब शाहजहां बेगम के शासन काल में ताजमहल में बने सावन-भादों में जाफरानी रंगों से होली खेली जाती थी। होली पर बड़े औहदेदारों को रियासत की ओर से सोने की पिचकारियां होली खेलने के लिए भेंट की जाती थीं।
नवाब शाहजहाँ बेगम का निवास ताजमहल में हुआ करता था। महल में हर वर्ष हुलियारों की महफिल जमती थी। रियासत के औहदेदार और आम लोग ताजमहल के प्रांगढ़ में बने खूबसूरत चौकोर फव्वारों जिन्हें सांवन-भादों कहा जाता है, में जमा होते थे। यहाँ चांदी के कटोरों में जाफरान (कैसर) व केवड़े के मिश्रण से बने रंग से होली खेली जाती थी। शाहजहां बेगम खुद इस जश्न में शामिल होती थी। उनके द्वारा रियासत के खास लोगों को सोने से बनी पिचकारियां होली खेलने के लिए दी जाती थीं।
बाद में भी रहा यह सिलसिला जारी
नवाब शाहजहां बेगम के बाद होली मनाये जाने का सिलसिला बाद के नवाबों दौर में भी जारी रहा। इतिहासकारों के मुताबिक नवाब हमीदुल्ला खान के कोहेफिजा स्थित महल कस्र-ए-सुल्तानी में होली के दूसरे दिन होली मनाने का कार्यक्रम आयोजित किया जाता था।
इसमें भोपाल रियासत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अवद नारायण बिसारिया, नवाबी खानदान के फेमिली ज्वेलर्स मदनलाल अग्रवाल व घड़ी साज(घड़ियां सुधाने वाले) गुलास राय सहित शाही परिवार से जुड़ी शहर की विभिन्न हस्तियाँ शामिल होती थीं। नवाब हमीदुल्ला खान इनके साथ होली मनाने के बाद सीहोर होली मनाने जाया करते थे। जो उस वक्त रियासत का एक हिस्सा हुआ करता था,सीहोर के कई हिस्सों में यहाँ से शुरू हुई परम्परा को आज भी पूरा किया जाता है और दूसरे दिन भी होली मनाई जाती है।
रियासतकाल में होली मनाने की अनोखी परम्परा थी। पहले ताजमहल में और बाद में अहमदाबाद पैलेस में होली मनाई जाती थी। इसमें धर्मो के लोग धार्मिक भेदभाव से ऊपर उठकर होली खेला करते थे। सोने की पिचकारियों से होली खेलने की परम्परा भोपाल के अलावा ओर कहीं नहीं मिलती।
एसएम हुसैन आर्किटेक्ट और नवाबी परिवार से संबंधित
ताजमहल के सावन-भादों में होली मनाई जाती थी। सावन-भादों के अंदर तांबे की नलकियों से पानी इस तरह बहता था जैसे सावन की झड़ी लगी है। इस माहौल में होली खेलने का अपना अलग ही महत्व होता था।
सैयद अख्तर हुसैन, द रायल जनी आफ भोपाल के लेखक
आर के से बिग बी तक सभी तर हैं रंगों से
अमिताभ बच्चन के बंगले प्रतीक्षा में होता है अब होली का आयोजन |
लेकिन ज़माना बदला और आरके स्टूडियो की रौनक ख़त्म हो गई अब बिग बी का ज़माना है और फ़िल्मी दुनिया की होली का रंग जमता है अमिताभ बच्चन के बंगले 'प्रतीक्षा' में.
पहले कहा जाता था कि जिस हीरो-हीरोइन ने आरके स्टूडियो में होली नहीं खेली उसने क्या होली खेली.
बीते ज़माने के किसी भी कलाकार से होली की बात करें तो उसके ज़हन में आरके की होली ही नज़र आती है.
पृथ्वीराज से राजकपूर तक
शशि कपूर |
इन्हीं यादों के गलियारे से गुज़रते हुए शशि कपूर अपने पिता पृथ्वीराज कपूर के समय मनाई जाने वाली होली के बारे में बताते हैं- "पृथ्वी थियेटर्स के सारे कलाकार मिलकर राग-रंग का उत्सव मनाया करते थे और आस-पास के फ़िल्मी गैर-फ़िल्मी कलाकार, बिन बुलाए जुट जाया करते थे."
अबीर गुलाल लगाने के बीच पृथ्वी थियेटर्स के लोग मेहमानों को पूरी-भाजी परोसते थे और होली का दिन रंग के साथ नाच-गाने से सराबोर हो उठता था.
पृथ्वीराज कपूर की इसी परंपरा को राज कपूर ने आरके स्टूडियो के निर्माण के साथ संस्थागत रूप दे दिया. 1952 के आसपास जब फ़िल्म 'आह' और आरके स्टूडियो दोनों मुकम्मिल हुए तो शशि कपूर की उम्र मात्र 14 साल थी मगर आरके की होली और मस्ती भरी हुड़दंग उन्हें बखूबी याद है.
एक बड़े टैंक में रंग और दूसरी तरफ भंग मेहमानों के स्वागत के लिए तैयार किए जाते थे. और हर आने वाले को उन दोनों से सराबोर किया जाता था.
फ़िल्मों में साथ काम करने वाली सभी हीरोइनें आरके स्टूडियो में उपस्थित होती थीं |
फ़िल्म उद्योग से जुड़ी लगभग सभी छोटी-बड़ी हस्तियाँ आरके की होली में शरीक होती थीं. मशहूर नृत्यांगना सितारा देवी का नृत्य तो इस होली की ख़ासियत थी ही मगर शैलेन्द्र के गीतों और शंकर जयकिशन के संगीत से समाँ बंध जाया करता था.
इस महफिल में खान-पान की जिम्मेदारी नरगिस पर होती थी. वैजंतीमाला और सितारा देवी की एक नृत्य जुगलबंदी की याद शशि कपूर ख़ास तौर पर करते हैं. इस अनूठे और मस्तीभरे प्रयोग से उस साल की होली का मज़ा कई गुना हो गया था.
आने वाले सालों में आरके की होली ख़ुद अपनी पहचान बन गई और इंडस्ट्री के साथ-साथ देश को भी इसका इंतजार रहने लगा.इस साल पता नही क्या होगा
बदलते रंग
1970 के आस-पास फ़िल्म इंडस्ट्री बुरे दौर से गुज़र रही थी और आरके में भी ‘मेरा नाम जोकर’ के पिट जाने से मायूसी थी, मगर सन् 74 के आते-आते बॉबी की सिल्वर जुवली से खुशियों के रंग फिर लौट लाए और इस साल फ़िल्म जगत ने आरके की होली में अपनी बदहाली से उबरने का जश्न भी मनाया.
शशि कपूर की पत्नि जेनिफर कपूर भी होली में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया करती थीं. शशि कपूर को याद है कि राज कपूर की पीढ़ी के लोगों के अलावा कई पीढ़ी के उभरते कलाकार भी आरके की होली में जोर-शोर से शामिल होते थे.
दरअसल आरके की होली फ़िल्मी लोगों के लिए एक ऐसा पड़ाव भी जहाँ वो सालभर के काम के बाद मस्ती भरी तरावट पा जाते थे.
राज कपूर की बीमारी और निधन के साथ इस होली का रंग फीका पड़ता गया और आरके की मशहूर होली इतिहास हो गई.
‘प्रतीक्षा’ की होली
आरके की होली के बंद होने के कुछ बरसों बाद तक एक तरह का शून्य रहा.
राज कपूर की विरासत को अमिताभ बच्चन आगे बढ़ा रहे हैं |
फिर अमिताभ बच्चन ने सामूहिक रूप से मिल-बैठने की परंपरा को अपने ढंग से ‘प्रतीक्षा’ में निबाहने की कोशिश शुरु की.
धीरे-धीरे ‘प्रतीक्षा’ की होली का रंग जम गया.
अब तो अक्षय कुमार से लेकर एश्वर्या राय तक शहर में मौजूद हर हस्ती ‘प्रतीक्षा’ की होली के लिए प्रतीक्षारत रहती है.
मगर जहाँ लोग पुराने शिकवे शिकायत भूल रंग और नरंग में डूबने कम और जान पहचान के साथ रिश्तों के नए समीकरण बिठाने ज़्यादा आते हैं.
लेकिन दोनों होली में एक मूलभूत अंतर नज़र आता है शायद बदलते ज़माने के प्रतीक स्वरुप या फिर शोमैन राजकपूर और बिग बी की अलग जीवनदृष्टि के कारण.
आरके की होली जहाँ फ़िल्म इंडस्ट्री की मस्ती और रिश्तों की गर्माहट का आईना हुआ करती थी वहीं प्रतीक्षा की होली ‘पेज थ्री’ की होली होती है जो रिश्तों के लिए कम और अपने मीडिया कवरेज के लिए ज़्यादा जानी जाती है.
क्या कहते हैं लोग
‘कलकत्ता’ और ‘चमेली’ के निर्देशक सुधीर मिश्रा को होली से प्यार है वो कहते हैं कि होली ही एकमात्र त्योहार है जिसमें पूरी इंडस्ट्री तहे दिल से मिलती और मस्ती में खिलती है.
सुधीर की होली अपने दोस्त केतन मेहता और नसीरुद्दीन शाह को रंगने से शुरू होती है और फिर उनका कारवाँ निकल पड़ता है, इंडस्ट्री के बड़े-छोटों को अपने रंग में रंगने. इस सफ़र में अमिताभ बच्चन का घर भी आता है और जुहू बीच भी, जहाँ आम मुंबइया अपनी होली मनाने जुटता है.
सुधीर के लिए शालीनता से मनाई जाने वाली होली ऐसा त्यौहार है जिसकी मस्ती में डूबकर बीते दिनों की कड़ुवाहट घुल जाती है.
फ़िल्मों में भी होली का ग़ज़ब का रंग रहा है: सिलसिला में अमिताभ बच्चन और रेखा (फ़ोटो-यशराज फ़िल्म्स) |
ज़रूरत और व्यस्तता के चलते फ़िल्म जगत का एक वर्ग होली काम करते हुए ही मनाता है.
‘लगान’ और ‘गंगाजल’ के चर्चित अभिनेता यशपाल शर्मा पिछले दो सालों से अपनी होली निर्देशक प्रकाश झा के साथ शूटिंग करते हुए मना रहे हैं.
वे कहते हैं कि काम की अपनी तरंग होती है और होली का रंग तो काम पर भी छलक ही जाता है मगर बेफ़िक्री से खुलकर होली मनाने का मज़ा ही कुछ और है.
इंडस्ट्री के दोस्तों के बीच मनाई जाने वाली बंबई की होली को यशपाल ‘मिस’ करते हैं.
जलवा और चालबाज़ के ख्यातिनाम निर्देशक पंकज पराशर इन दिनों अपनी नई फ़िल्म ‘बनारस’ की शूटिंग में व्यस्त हैं. इस साल तो अपनी होली बनारस में मनाने जा रहे हैं और बनारस की ख़ास होली का रंग पूरी तरह जश्न करने के लिए उन्होंने होली के दिन छुट्टी रखी है ताकि अपनी यूनिट के साथ शिव की नगरी “वाराणसी” में जमकर होली की हुड़दंग की जा सके.
मगर मुंबई की होली भी उन्हें कम प्यारी नहीं है और वे अपने अपने मित्र अमिताभ के घर ‘प्रतीक्षा’ में मनाई जाने वाली होली को याद करते हैं.प्रस्तुति सहयोग सधन्यवाद बीबीसी आज ये मधुर गीत फ़िल्म धनवान से है ,बहुत ही अच्छा संदेश देता है ,होली के कुछ तर खोलता है और रंग घोलता है .
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पंजाब का होला मोहल्ला और हरियाणा की धुलन्डी
आज हम आप को लिए चलते हैं पंजाब के एक मोहल्ले में और हरियाणा की धुलन्डी में बशर्ते आप झूमेंगे।
हाँ और जाने से पहले गीत जरूर सुनियेगा
पंजाब का होला मोहल्ला
पंजाब मे भी इस त्योहार की बहुत धूम रहती है। सिक्खों के पवित्र धर्मस्थान श्री अनन्दपुर साहिब मे होली के अगले दिन से लगने वाले मेले को होला मोहल्ला कहते है।
सिखों के लिये यह धर्मस्थान बहुत ही महत्वपूर्ण है।कहते है गुरु गोबिन्द सिंह(सिक्खों के दसवें गुरु) ने स्वयं इस मेले की शुरुआत की थी।तीन दिन तक चलने वाले इस मेले में सिख शौर्यता के हथियारों का प्रदर्शन और वीरत के करतब दिखाए जाते हैं। इस दिन यहाँ पर अनन्दपुर साहिब की सजावट की जाती है और विशाल लंगर का आयोजन किया जाता है।
कभी आपको मौका मिले तो देखियेगा जरुर।
हरियाणा की धुलन्डी
हरियाणा मे होली के त्योहार मे भाभियों को इस दिन पूरी छूट रहती है कि वे अपने देवरों को साल भर सताने का दण्ड दें।इस दिन भाभियां देवरों को तरह तरह से सताती है और देवर बेचारे चुपचाप झेलते है, क्योंकि इस दिन तो भाभियों का दिन होता है।
शाम को देवर अपनी प्यारी भाभी के लिये उपहार लाता है इस तरह इस त्योहार को मनाया जाता है। भारतीय संस्कृति मे यही तो अच्छी बात है, हम प्रकृति को हर रुप मे पूजते है और हमारे यहाँ हर रिश्ते नाते के लिये अलग अलग त्योहार हैं।
ऐसा और कहाँ मिलता है।
और फिर सुनिए ये हरयान्वी होली गीत ,नया ही है, आनंद लीजिये
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कृष्ण-राधा से लेकर अकबर-जोधाबाई तक(रंग बरसे आप झूमे श्रृंखला भाग ९)
कृष्ण-राधा से लेकर अकबर-जोधाबाई
मिथक से लेकर इतिहास तक होली का ज़िक्र रंग और मस्ती के त्यौहार के रुप में होता है |
हर समय काल में होली का रंग और उसकी मस्ती एक जैसी होती आई है.
बाजों और नगाड़ों के बीच रंग और गुलाल की छटा के बीच हुड़दंग और चुहलबाज़ियाँ.
प्रहलाद और होलिका के प्रसंग को छोड़ दें तो मिथक में भी होली के फागुन की मस्ती में सराबोर उदाहरण ही मिलते हैं.
कृष्ण की राधा के साथ आय की जो तस्वीरें चित्रकारों ने कल्पना से बनाई हैं वो देखते ही बनती हैं.
फिर वो चाहे रंग शताब्दी ही ओंगे की पेंटिंग हो या फिर मेवाड़ तक चित्रकला या फिर बूंदी, कांगड़ा और मधुबनी शैली का चित्र हो कृष्ण और गोपियों की होली के चित्र कलाकारों की पसंद रहे हैं.
मुगलों की होली
सबसे प्रामाणिक इतिहास की तस्वीरें हैं मुगल काल की और इस काल में होली के क़िस्से उत्सुकता जगाने वाले हैं.
अकबर का जोधाबाई के साथ रंग खेलना अपने आपमें उस समाज की कई कहानियाँ कहता है.
अकबर के बाद जहाँगीर का नूरजहाँ के साथ होली खेलने का ज़िक्र मिलता है.
शाहजहाँ के ज़माने तक तो होली खेलने का मुग़लिया अंदाज़ ही बदल गया था.
इतिहास में दर्ज है टी शाहजहाँ के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी कहा जाता था या आब-ए-पाशी यानी रंगों की बौछार कहा जाता था.
आख़िरी मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र तो होली के दीवाने ही थे.
उनके लिखे होली के फाग आज भी गाए जाते हैं.
''क्यों मो पे मारी रंग की पिचकारी, देखो कुँअर जी दूंगी गारी'' लिखने वाले बहादुर शाह जफ़र के बारे में मशहूर है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे.
मेवाड़ की चित्रकारी में दर्ज़ है कि महाराणा प्रताप अपने दरबारियों के साथ मगन होकर होली खेला करते थे.
राजस्थान के किलों और महलों में खेले जाने वाली होली के रंग तो पूरी दुनिया में मशहूर रहे हैं. वरना बिल क्लिंटन की बिटिया अमरीकी राष्ट्रपति का आवास छोड़कर होली ?
प्रस्तुति सहयोग बीबीसी हिन्दी.कॉम
'जब फागुन रंग चमकते हों "